ग़ज़ल~BY ASRAR DANISH

ग़ज़ल

आंखों को मैं अपनी चुरा भी नहीं सकता
है जख्म जो सीने में दिखा भी नहीं सकता

मैं हूं के चरागों को बुझा भी नहीं सकता
परवाने को जलने से बचा भी नहीं सकता

होना है जो, हर हाल में होकर ही रहेगा
क्या-क्या नहीं होगा ये बात भी नहीं सकता

हर शख्स से मजबूत तो रिश्ता भी नहीं है
हर शख्स प हर चीज लूटा भी नहीं सकता

क्या उसको मनाने की कोई और है सूरत
सूरज को जमीं पर तो बुला भी नहीं सकता

रखने की उसे याद भी हाजत नहीं लेकिन
उस को किसी सूरत मैं भूला भी नहीं सकता

उस शख्स से क्या हाथ मिलाने की जरूरत
जिस शख्स को सीने से लगा भी नहीं सकता l

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Featured image credits to CharlVera on Pixabay

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